The Poem Below was my first Attempt in the vast sphere of English Sonnets. The speaker in the poem has lost his wife and in a fit of helplessness and melancholy, He calls her unfaithful as to why she perished away leaving him solitery in the world. All the same, He consoles himself saying that she will remain with him forever and she revives in his thoughts of her where she is still alive and will go on for the rest of his life:
Unfaithful!!!
If Only Thou Were There,
Sharing The Pangs Of Life With Me,
To Lead A Life, If Thou Would Dare,
Never Would I call Thee, Thee Never To Be,
I Remember The Time Has Slipped Away
When Sweetening Things THou Looked Innocent,
Unworried We Had The Joys Of Heyday,
Unmoved To The Worldly Affairs And Rapture Present,
Though All This Ended With Thy Sudden Flight,
Leaving Me Alone With The Rest Cursed Years,
Beyond The World To Heaven, Ah! Measureless Height,
Never To Return Thou Left, Drowning Me In Tears,
Yet My Sole Love, The Moment I Remember Thee, Thee Revive
In My Sweet Memories Of Thee Where Thou Still Survive.
Friday, August 24, 2007
Unfaithful
Posted by विजय स्वामी at 3:11 AM 0 comments
O God!
O God! Let Me Come Close To You,
I Just Want To See You Being True,
This World Is Deprived Of You,
Let Me not Be of That View;
O God! I Met No one When I was Young
Who Could Claim To Have Seen You,
Unfortunately, There Are Still Few,
I Do Not Want To Be One Of Them Too,
So Let Me Come Close To You,
O God! Let Me Touch You Only Once,
By It Let Me Ensure Your Presence,
Let Me Not Bring Up The Doubt,
What, In My Mind, Your Absence Has braught,
Let Me See How You Are And Who,
So Let Me Come Close To You.
O God! Why, Tell Me, Why So Cruel To Me
Forget Me Not I Am Too Your Baby,
Not I Am An Athiest As Many Guess,
But Quitely, steadily In Your Quest,
I Just Love You Let Me Woo,
So Let Me Come Close To You.
O God! Raise Your Hand To Bless My Fate,
Why So Delay, Why It So Late,
Never I Want What Others Do (Want) ,
I Merely Long To Get Your View,
So Let Me Come Close To You.
O God! I Wait The Moment Of Your Arrival,
For I Know You Love Your Child,
Whether Civilized or He Is Wild,
For I Know Your Heart Is Great,
O God! O God! O God!
Let Me Tell This World The Whole Of You,
So Please Let Me Come Close To You.
Posted by विजय स्वामी at 2:20 AM 0 comments
वो
वो - जिसे मैं ख्वाबों में देखता हूँ,
आंखों के रस्ते से, दिल मे सहेजता हूँ ,
रहती है जो संग मेरे,
हरदम, हरक्षण,
न जाने फिर भी ढूँढता है,
क्यों उसको मेरा ये पागल मन,
प्रतिपल, प्रतिक्षण
वो- और उसकी मीठी सी हंसी,
कितना निर्मल, निश्छल मन,
हर लफ्ज़ मे है प्यार भरा,
हर शब्द में है कितना अपनापन।
वो- लगता है, यहीं नजदीक कहीँ ,
क्यों देख नहीं पाता हूँ उसे,
रग-रग में मेरे बसी है जो,
दुनिया में कहाँ ढूँढू मैं उसे।
'वो' न रहो तुम सामने आ जाओ,
यूं और मुझे तरसाओ ना,
न और करो तुम परख मेरी,
मैं देवता नहीं इन्सान हूँ माँ।
Posted by विजय स्वामी at 12:55 AM 0 comments
मेरी बहिना
मैं उससे मिला, बातें की, और फिर हम जुदा हो गये। मैं नहीं जानता कि बहिन कैसी होती है ! मगर उससे मिला तो लगा कि बहिन शायद ऐसी ही होती हैं। आज छ: वर्ष हो गये उस बात को। पर सोचता हूँ तो लगता है कि जेसे कल कि ही बात हो। ये कविता मैंने उस वक़्त लिखी थी जब हम पहली बार मिले थे:
काश मेरी बहिना तुम होती मेरे पास,
तो जान पाती शायद, तुम बिन मैं हूँ कितना उदास,
ये बेबसी है मेरी या तकदीर का सितम,
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें, तुमसे जुदा होने का गम।
आंखों में सजी थी बचपन से जो मेरी,
उस मासूम तस्वीर का नाम हो तुम,
ख्वाहिश थी इक बहिन कि दिल मे दबी,
उस तरन्नुम ख्वाहिश का अंजाम हो तुम।
जाना है मैंने तुम्हें थोडा अभी,
पर हम हैं जुदा ऐसा लगता नहीं,
वो चन्द पल जो बीते पहलू में तेरे,
भुला पाउँगा कैसे मैं वो पल सुनहरे।
तेरी बातों मे पाया वो अपनापन,
तलाश रहा था जिसे वर्षों से मन,
मैं कैसे भुला दूँ वो लम्हें 'विजय'
मैंने जाना कि क्या होती है बहिन।
घर लोटने को जब तुम हो रही थी विदा,
मन उदास था , मैं तुम्हें विदा भी ना कह सका,
पर याद रखूंगा मैं तुम्हें, तुम्हारी हर बात,
जिंदगी भर संजोकर रखूंगा, ये मधुर मुलाक़ात।।
Posted by विजय स्वामी at 12:16 AM 0 comments
Labels: बहिन
Tuesday, August 21, 2007
मेरे भैया
वक़्त कि आतिशें जब भी दिल जलाती हैं, तेरी याद आती है,
उम्मीदों कि ठण्डी हवाएं फिर दिल को सहलाती है, जब तेरी याद आती है।
तेरी खामोशियों मे छुपा तेरा प्यार है,
गम क्या जो तुने ना जताया कभी,
मेरी ख़ुशी तेरी आंखों मे शुमार है,
गम क्या तेरे होंठों ने ना बताया कभी,
तेरी खामोशियाँ तेरी यादों के गीत गाती हैं, जब तेरी याद आती है
अभी तक सहेज कर रखीं हैं मैंने,
अपने बचपन की वो खुबसुरत यादें,
वो साथ उठना, खाना-पीना वो सोना,
वो माँ की प्यार भरी थपकियों सी रातें
हर सुबह फिर उन सुबहों कि याद दिलाती है, जब तेरी याद आती है
कहाँ भूला हूँ मैं तेरे साथ का बिछोना,
अभी याद है मुझे मेरा तकिये के लिए रोना,
पर आह! तेरा साथ क्या था इक दुनिया थी मेरी,
मेरी निगाहें भी सदा थी तुमको ही ढूंढती,
ये निगाहें आज भी तुमको ही ढूंढें जाती है, जब तेरी याद आती है
रहे शिकवा शिक़ायत यूं तो दर्मयां हमारे,
पर अपने लफ्जों से मेरा दिल ना दुखाया कभी,
मेरे सितम दर्ज हैं कई पीठ पर तुम्हारे,
तुमने पर हाथ ना उठाया कभी,
आजा कि इस सितमगर को भी ये तन्हाईयाँ सताती हैं, जब तेरी याद आती है
इस हुजूम मे थे यूं तो कितने हमसाये,
अपनों मे मगर एक तुम ही नज़र आये,
देख, जवां हो लिए तुमसे जुदा ही रहके,
आजा कि तुम्हे मिले बिना ही उमर गुजर ना जाये,
ये सांसे तेरे आने कि राह देखे जाती हैं , बस तेरी याद याद आती है
उम्मीदों की ठण्डी हवाएं दिल को सहलाती हैं, जब तेरी याद आती है ।
Posted by विजय स्वामी at 7:05 AM 0 comments
जिंदगी
जिंदगी मेरे हाथों से खोने को है,
मौज*-ए-वक़्त मुजे डुबोने को है;
कारवां दर्द का गुजरा है मेरे दिल से
जो ये आँसु मेरा दामन भिगोने को है।
दोस्ती के चिराग तो कभी के बुझ गये,
नफ़रतों की शाम आज होने को है।
मोहब्बत के किस्से सब फ़ना* हो गये,
फासला ईक दरमिया आज होने को है।
जिनकी राहों मे बिछकर हम ख़ाक हो गये,
मेरे क़दमों मे वो कांटे चुभोने को है।
रजा* हमारे लबों से चुरा ले गया कोई,
मजबुरिओं का बोझ हम ढोने को है।
तहजीब के दायरे को जब पार कर गये,
जुबा भी अब खंजर होने को है।
वक्त-ए-सहरा में तुम कहीँ खो गये,
मेरी तनहाईयां तेरी याद मे अब रोने को है।
तूफा भी हमारी बुलंदी को सर झुकाकर चले गये,
सफ़ीना* मगर हमसफ़र ही डुबोने को है।
इरादों में जब नाउम्मीदी के सुराख हो गये,
मुसाफिर राह-ए-मंझिल मे अब सोने को है।
शब्दार्थ: * लहर/ ख़त्म/ इच्छा/ कश्ती
Posted by विजय स्वामी at 7:00 AM 1 comments