Tuesday, August 21, 2007

जिंदगी

जिंदगी मेरे हाथों से खोने को है,
मौज*-ए-वक़्त मुजे डुबोने को है;
कारवां दर्द का गुजरा है मेरे दिल से
जो ये आँसु मेरा दामन भिगोने को है।

दोस्ती के चिराग तो कभी के बुझ गये,
नफ़रतों की शाम आज होने को है।

मोहब्बत के किस्से सब फ़ना* हो गये,
फासला ईक दरमिया आज होने को है।

जिनकी राहों मे बिछकर हम ख़ाक हो गये,
मेरे क़दमों मे वो कांटे चुभोने को है।

रजा* हमारे लबों से चुरा ले गया कोई,
मजबुरिओं का बोझ हम ढोने को है।

तहजीब के दायरे को जब पार कर गये,
जुबा भी अब खंजर होने को है।

वक्त-ए-सहरा में तुम कहीँ खो गये,
मेरी तनहाईयां तेरी याद मे अब रोने को है।

तूफा भी हमारी बुलंदी को सर झुकाकर चले गये,
सफ़ीना* मगर हमसफ़र ही डुबोने को है।

इरादों में जब नाउम्मीदी के सुराख हो गये,
मुसाफिर राह-ए-मंझिल मे अब सोने को है।

शब्दार्थ: * लहर/ ख़त्म/ इच्छा/ कश्ती

1 comments:

Anonymous said...

Nice Yaar! Keep it up. great work