मैं उससे मिला, बातें की, और फिर हम जुदा हो गये। मैं नहीं जानता कि बहिन कैसी होती है ! मगर उससे मिला तो लगा कि बहिन शायद ऐसी ही होती हैं। आज छ: वर्ष हो गये उस बात को। पर सोचता हूँ तो लगता है कि जेसे कल कि ही बात हो। ये कविता मैंने उस वक़्त लिखी थी जब हम पहली बार मिले थे:
काश मेरी बहिना तुम होती मेरे पास,
तो जान पाती शायद, तुम बिन मैं हूँ कितना उदास,
ये बेबसी है मेरी या तकदीर का सितम,
कैसे बताऊँ मैं तुम्हें, तुमसे जुदा होने का गम।
आंखों में सजी थी बचपन से जो मेरी,
उस मासूम तस्वीर का नाम हो तुम,
ख्वाहिश थी इक बहिन कि दिल मे दबी,
उस तरन्नुम ख्वाहिश का अंजाम हो तुम।
जाना है मैंने तुम्हें थोडा अभी,
पर हम हैं जुदा ऐसा लगता नहीं,
वो चन्द पल जो बीते पहलू में तेरे,
भुला पाउँगा कैसे मैं वो पल सुनहरे।
तेरी बातों मे पाया वो अपनापन,
तलाश रहा था जिसे वर्षों से मन,
मैं कैसे भुला दूँ वो लम्हें 'विजय'
मैंने जाना कि क्या होती है बहिन।
घर लोटने को जब तुम हो रही थी विदा,
मन उदास था , मैं तुम्हें विदा भी ना कह सका,
पर याद रखूंगा मैं तुम्हें, तुम्हारी हर बात,
जिंदगी भर संजोकर रखूंगा, ये मधुर मुलाक़ात।।
Friday, August 24, 2007
मेरी बहिना
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