वो - जिसे मैं ख्वाबों में देखता हूँ,
आंखों के रस्ते से, दिल मे सहेजता हूँ ,
रहती है जो संग मेरे,
हरदम, हरक्षण,
न जाने फिर भी ढूँढता है,
क्यों उसको मेरा ये पागल मन,
प्रतिपल, प्रतिक्षण
वो- और उसकी मीठी सी हंसी,
कितना निर्मल, निश्छल मन,
हर लफ्ज़ मे है प्यार भरा,
हर शब्द में है कितना अपनापन।
वो- लगता है, यहीं नजदीक कहीँ ,
क्यों देख नहीं पाता हूँ उसे,
रग-रग में मेरे बसी है जो,
दुनिया में कहाँ ढूँढू मैं उसे।
'वो' न रहो तुम सामने आ जाओ,
यूं और मुझे तरसाओ ना,
न और करो तुम परख मेरी,
मैं देवता नहीं इन्सान हूँ माँ।
Friday, August 24, 2007
वो
Posted by विजय स्वामी at 12:55 AM
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