छुटपन का अहसास
अब कहाँ है मेरे पास,
रोजी-रोटी के बोझ तले
घुट रही है साँस,
कामयाबी के दर की, हवा चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
जिंदगी की अजीब राहें, न मालूम
कहाँ ख़त्म हो कहाँ ले जाएँ,
ये सफर, न कोई रहगुजर
वक्त की लम्बी डगर,
इस सफर में , इस डगर में, 'उसे' हमसफ़र चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
गम के पालने में मेरी
खुशियाँ अभी पल रहीं हैं,
इंतजार-ऐ-जवानी में जिनके
जिन्दंगी पिघल रही है ,
ख़ाक में मिलने से पहले 'उनका' दीदार चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
Thursday, June 4, 2009
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
Posted by विजय स्वामी at 1:11 PM 1 comments
आलोचक के नाम...
मेरी प्रशंसा की छोटी सी घड़ी,
एक और से फिर न जा सकी सही;
मुझे न चाहने वालों में,
हैं लोग कई इक और सही ।।
मेरी भावनाओं के उकसाने पर,
हमेशा ही मैंने कुछ लिखा है,
जब कभी दर्द दिल में कसक-सी बन उभरा है
तो कभी प्यार
मुझे दिल के
गलियारों से गुजरते
कलम की स्याही से
कुछ कहने की चाहत से
शब्दों में ढलता हुआ दिखा है ।।
मैं लिखता हूँ शायद ---
भावनाओं के ज्वार को रोक पाने में जब कभी,
नाकामयाब हो जाता हूँ मैं;
जज्बातों के तेज दरिया में जब कभी,
डूबता हुआ-सा ख़ुद को पता हूँ मैं;
जब कभी जुबाँ न साथ दे पाती है दिल का,
तनहा ख़ुद को पाता हूँ मैं
तब, तब... न जाने कैसे?
बरबस ये हाथ चल पडतें हैं,
कुछ कहने की गरज से
कागज़ के खुरदरे धरातल पर
कलम की नोक से,
इच्छाओं, इरादों, यादों के
शब्द-रुपी भीज बोते जाते हैं
दिल के हमदर्द बनकर ।
लेकिन---
मेरी हर रचना अब कुछ डरी-सी, सहमी सी
लगती है मुझे,
मेरे भावों विचारों की हार-सी हुई
लगती है मुझे
जब कोई कहता है ,"क्या ये कहीं से चुराई हुई हैं?"
क्या मन के विचारों को चुरा सका है कोई,
'चोरी ' जैसे कलंक को
माथे का तिलक
बना सका है कोई
शायद तुम्हें न मालूम होगा ये
ओ ऐसा कहने वाले ,
पर मुझे है;
क्योंकि ---
जज्बातों को शब्दों में ढालने का हुनर है मुझमें,
चाहे किसी से कुछ कमतर ही सही;
उतरा हूँ मैं भी दिल की उन गहराइयों में,
जिनकी थाह ले पाना, हर किसी के लिए मुमकिन नहीं;
कहाँ सोचा होगा तुमने
ऐसा कुछ कहने से पहले
कि हर दिल में
कुछ सपने, यादें, इरादे होतें हैं
कुछ तमनायें होती हैं, कुछ वादे होते हैं;
और जो इनको अदा से कागज पे उतार पता है;
मेरे दोस्त,
संभवतया: वही कवि कहलाता है।
वैसे मेरी जिन्दगी के कुछ गिने-चुने वर्षों में,
मेरे आलोचक मेरे साथ रहे हैं,
परन्तुं---
इस दिल मेरे ने वो सब कुछ सहा है,
मुझे हमेशा सिर्फ़ इतना ही कहा है -
" नफ़रत करने वालों कि बस्ती में तेरी
रहने कि सदा आदत है रही,
तुझे न चाहने वालों में
हैं लोग कई इक और सही .
क्या फर्क तुम्हें पड़ता 'विजय' ?
इस बात को तू बस भूल यहीं,
तुझे न चाहने वालों में
मेरे भाई, चलो इक और सही ।। "
ये वहीं भावनाएं हैं मेरी
जो तुमसे ठोकर खाई हुई हैं ,
अब बताएं आलोचक महोदय
क्या ये भी चुराई हुई हैं?
Posted by विजय स्वामी at 12:09 PM 0 comments
शमा-ऐ-जिन्दंगी (माँ)
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा;
मेरी जिन्दंगी इनायत तेरी,
मेरी ख्वाहिशों की तू इंतहा ।।
गम के अंधेरों से मुझको निकाला,
तुमसे ही जीवन में बिखरा उजाला;
तेरे प्यार की नहीं हद कहीं, तेरे प्यार की नहीं इंतहा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
ममता को मेरे कदमों में बिछाया,
दिल के घरोंदे में मुझको बसाया;
मन में बसी इबरत तेरी,
मेरी हर घड़ी की तू इश्तिहा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
आँचल के साये में मुझको छुपाया,
दिल के सिंहासन पे मुझको बैठाया;
मेरे पास हर पल तू है रही,
मेरे पास हर पल तू है सदा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
Posted by विजय स्वामी at 11:54 AM 0 comments
मैं जानता हूँ...
मैं जानता हूँ कि धोखा खा नहीं सकते किसी से,
तुम्हें भी जहर अपनों ने ही पिलाया होगा ।।
मैं जानता हूँ कि दुश्मनों में तुम्हारे न हिम्मत थी इतनी,
तुम्हें भी किसी न दोस्त बनकर हराया होगा ।।
मैं जानता हूँ कि बड़े शौक से देखे थे सपने कई तुमने,
तुम्हें भी शायद मुक़द्दर ने सताया होगा ।।
मैं जानता हूँ कि दर्द को सहना तो आदत थी तुम्हारी,
तुम्हें भी शायद खुशी ने रुलाया होगा ।।
मैं जानता हूँ कि नहीं खौफ खाते तुम अंधेरों से,
तुम्हें भी खौफ चिरागों ने दिलाया होगा ।।
Posted by विजय स्वामी at 11:19 AM 0 comments
Tuesday, June 2, 2009
वक्त
वक्त रूठा रहा उम्र भर बच्चे की तरह,
तेरे जहाँ में ऐ खुदा कोई खिलौना न मिला;
Posted by विजय स्वामी at 2:23 PM 0 comments
आरजू
लम्हा-लम्हा ये जिन्दंगी गुजर जायेगी,
जिस्म -ऐ ख़ाक से रूह बिछड़ जायेगी;
फ़िक्र करता हुं कि काबिल-ऐ-जिक्र बन जाऊं मगर,
कोशिश वो लम्हा जाने कब लाएगी ;
Posted by विजय स्वामी at 2:20 PM 0 comments
इतिहास विषय पढाने का क्या औचित्य है ? : मेरा दृष्टिकोण
स्कूल में पढता था तब अक्सर सोचा करता था की विज्ञानं, गणित इतियादी विषय किसी न किसी तरह से जीवन को प्रभावित करते हैं अथवा किंसी न किसी रूप में अपना योगदान देते हैं परन्तु इतिहास पर आते ही सुई अटक जाती थी । लाख सोचने पर भी इतिहास विषय को पदाने का औचित्य समझ में नहीं आता था। खैर , स्कूल का वक्त और था। परन्तु आज भी हम में से कितने युवा ऐसे हैं जो इस प्रश्न का ठोस उत्तर देने में सक्षम है ? ये लेख इस प्रशन का उत्तर खोजने की एक कोशिश मात्र है । समीक्षा लेखन क्षेत्र में मेरा ये प्रथम प्रयास है। संभावित त्रुटी के लिए कृपया क्षमा करें । आपके विचारो एवं टिपण्णी की प्रतीक्षा रहेगी।
विभ्भिन प्रतियोगी परीक्षाओं में इतिहास विषय के प्रश्न पत्र के सम्बन्ध में प्राय यह सुनने में आता है की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इस विषय का कोई औचित्य नहीं है। यहाँ तक कि इतिहास विषय के विधालयों में अध्यापन्न पर भी कई सवाल खड़े किए जाते रहे हैं । साथ ही वर्तमान परिपेक्ष्य में प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है । आलोचकों का तर्क है की प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का वर्तमान मानव जीवन से कोई व्यावहारिक सम्बन्ध कतई दृष्टिगोचर नहीं होता है , यथा रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत "स्टेशन मास्टर" के पद पर नियुक्त व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में चन्द्रगुप्त की भला क्या भूमिका हो सकती है ? अथवा बाबर की तुलुगमा पद्दति उसके रेलवे सम्बन्धी क्रियाकलापों में किस तरह सहायक हो सकती है ?
यद्यपि सतही तौर पर देखने पर हम उपर्युक्त तर्कों को निराधार नही मान सकते परन्तु इतिहास विषय की प्रासंगिकता को सिरे से खारिज कर देना कदाचित एक बड़ी भूल होगी। इतिहास विषय की मूल विशेषता इसका विस्तृत एवं व्यापक कलेवर है जो साधारण अधययनार्थी के लिए अतिशय कठिन एवं दुर्बोध मालूम पङता है। अधिकांश अधययानार्थी इस विषय में वर्णित विभिन्न प्रकरणों, घटनाओं एवं प्रसंगों में अंतर्निहित मर्म एवं संदेशों को ग्रहण करने में विफल रहते हैं । वस्तुत: इतिहास अतीत को समाहित किए हुए सभी विषयों का मूल श्रोत है । विज्ञानं , सामाजिक ज्ञान , भूगोल इतियादी विषयों की जड़ें इतिहास में स्पष्टत: देखी जा सकती हैं , बशर्ते इस विषय के संधर्भ में एक पूर्वाग्रहरहित एवं व्यापक समझ विकसित की जाए।
जहाँ तक इस विषय के पठन-पाठन एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में इसकी प्रासंगकिता का प्रश्न है तो इस सम्बन्ध में यह निशिचित तौर पर कहा जा सकता है कि इतिहास मनुष्य को एक सुदृढ़ नैतिक आधार प्रधान करता है एवं इस प्रकार अंतत: व्यावहारिक जीवन हेतु पृष्ठभूमि तैयार करता है । बचपन में दादी-नानी कि कहानियों से लेकर सुबह चाय कि प्याली के साथ समाचार-पत्र पढ़ते हुए हमें इतिहास के ही दर्शन होते हैं। इसमे कोई दो राय नहीं कि विगत घटनाओं का हमारे भावी जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है । इस प्रकार दादी-नानी द्वारा कही राजा-रानी की कहानियाँ जो मुख्यत इतिहास के पात्रों को ही चित्रित करती हैं एवं समाचार-पत्र आदि हमें बेहतर भविष्य की और अग्रसर होने में उत्प्रेरक-मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करते हैं। इतिहास विषय का सूक्ष्म अध्ययन एवं समझ जीवन , देश एवं काल के प्रति हमारे नज़रिए में आधारभूत एवं क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम है।
बाबर जैसे विराट पुरूष का संघर्षपूर्ण जीवन हमें कठिनाइयों से जूझने का संदेश देता है। आज का युवा प्रथम प्रयास में ही परिस्तिथितियों के समक्ष घुटने टेक देता है। इस सन्दर्भ में बाबर जैसे जुझारू पुरूष का जीवन हम में आत्म-विश्वाश से पूर्ण एवम जीवट से भरपूर जीवन के प्रति अनुराग पैदा करता है । हैदरअली जैसे धरातल से सत्ता की ऊँचाइयों को छू लेने वाले एतिहासिक व्यक्तित्व हमारे लिए सर्वोत्तम आदर्श स्थापित करते हैं । वर्तमान परिदृश्य में चहुँ और अन्याय , लाचारी, बईमानी, चोरी , भ्रष्टाचार अपने भयानक स्वरूप में परिलक्षित हो रहें हैं । ऐसे समाज में आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए आज बलबन एवं शेरशाह सूरी जैसे चरित्रों की महत्ती आवश्यकता है। नित्यप्रति महिलाओं से दुराचार हो रहा है। नारी की मर्यादा का हनन करने वाले असंख्य निर्लज्ज दुशाशन अपने पाशविक इरादों को अंजाम देने के लिए आज हर गली-नुक्कड़ पर घात लगाये बेठें हैं । इन दुशाशनों पर लगाम कसने के लिए श्रीकृषण जैसे इतिहास-पुरषों का आह्वान आधुनिक समय की सबसे बड़ी मांग है । जिस युग में पिता-भाई जैसे पावन रिश्ते भी हवश की बलिवेदी पर दम तोड़ चूंके हों उस युग को शिवाजी जैसे निर्मल हृदयी वीर की दरकार है जो उपहार स्वरुप भेंट की गई स्वाधीन शत्रुभार्या (शत्रु की पत्नी) को भी माँ का दर्जा देते हुए स्त्री-सम्मान का अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत करते हैं । इतिहास साक्षी है की सदभावनापूर्ण किए गए परोपकारी कार्यों के लिए निपट अनपढ़ अकबर 'महान' बन जाता है तो वहीं अति शिक्षित, धर्म शास्त्रों को कंठस्थ रखने वाला औरगंजेब का चरित्र हमारी घृणा का पात्र बनता है। इसके मूल में यही भाव निहित है की जहाँ हम सद्कर्मों के माध्यम से पूजनीय बन सकते हैं, वही कपटपूर्ण कार्यों द्वारा व्यक्ति , समाज एवं देश का अहित करते हैं जिसके लिए औरंगजेब की भांति भविष्य हमें कदापि क्षमा नहीं करेगा ।
तर्क में उल्लेखित "स्टेशन मास्टर" भी एक सामाजिक प्राणी है जो पद के माध्यम से समाज एवं देश की सेवा का कार्यभार वहन करता है । उसके द्वारा लिए गए निर्णयों से कई व्यक्तियों का जीवन प्रभावित होता है । इतिहास के चरित्रों , घटनाओं अथवा प्रसंगों से शिक्षा ग्रहण कर वह अपने कर्तव्यों का उत्तम प्रकार से निष्पादन कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वाश है ।
इस प्रकार इतिहास विषय मात्र घटनाओं का गठ्ठर अथवा बीते कल की जुगाली नहीं है , अपितु यह तो सुदूर उतरायण में टिमटिमाते हुए उस ध्रुव तारे के समान है जो यद्यपि पर्याप्त प्रकाश देने में अक्षम है तथापि दूषित एवं गिरते हुए जीवन मूल्यों की स्याह अँधेरी रात्रि में , जब चंहु और कोई सूर्य दिखाई नहीं पड़ता , हम दिग्भ्रमित मनुष्यों को सही दिशा का ज्ञान करा सकता है । अत: जरुरी है की हम इतिहास विषय के प्रति अपना दृष्टिकोण बदले । बेहतर कल के लिए इतिहास विषय पर अवलंबन वांछनीय है क्योंकि "इतिहास की पुनरावृति होती है" ।
Posted by विजय स्वामी at 11:19 AM 0 comments
Sunday, May 31, 2009
गरीब-ऐ-शहर
ऐ मुसाफिर!
ज़ख्म बीती यादों का सोने नहीं देता,
सांसों में भी खंजर चुभोये बेठें हैं;
इक तू ही आकर देख ले इस गरीब-ऐ-शहर की हालत,
कि खुदा को तो ख़ुद से रुठाये बेठें हैं;
बचपन कि जब सारी यादें विदा हुई,
क्यों किसी कि याद को दिल से लगाये बेठें हैं;
ढह गई हैं भरोसे कि कच्ची दीवारें सभी,
लोग हाथों में पत्थर अब उठाये बेठें हैं;
ये धूंआ मेरी हसरतों का है मुसाफिर,
कि घर मेरा लोग पहले से जलाये बेठें हैं;
इस तंगदिल जहाँ में अब कोई ठिकाना न रहा ,
कि घुटनों पे सर को हम टिकाये बेठें हैं;
खामोश मेरे संग शहर की गलियां सब हुई,
जाने किस की आहट पे कान लगायें बेठें हैं;
उम्र भर ख़ुद को ही तलाशता रहा हूँ मैं,
चेहरों के इस जंगल में पहचान गवाए बेठें हैं;
खो गई है मंजिल मेरी जमाने की अधेरीं राहों में,
ढूंढकर लाने को हम बेशक दीया जलाये बेठें हैं;
दर्द मेरा बढ़कर ख़ुद दवा हो गया है,
कहाँ किसी हकीम के आरजू लगाये बेठें हैं;
एक-एक कर सब अपने बेगाने हुयें हैं,
उनसे भी ये उम्मीद खैर लगाये बेठें हैं;
बिखर गया हूँ यूँ तो मै जार-जार होकर,
लोग अब भी घात मगर लगाये बेठें हैं;
मरने की कोई वाजिब सबब नहीं मिलता,
लोग मरने के तरीके खैर सुझाये बेठें हैं;
बात नहीं करता क्यों सीधे मुँह से कोई,
जाने क्यों लोग हमसे ख़ार खाए बेठें हैं;
जुबान से नाता तोड़ लिया है हमने जबसे,
खामोशी से दिल अपना लगाये बेठें हैं;
ये किसने नाम लिया खुशी कि आंसू निकल पड़े,
ज़नाजा जिसका सर पे हम उठाये बेठें हैं;
अब तो ग़म से दोस्ती हो गई है इस कदर,
चेहरे को भी तस्वीर-ऐ-ग़म बनाये बेठें हैं;
आते थे सपने कभी अब तो नींद भी नहीं आती,
निगाहों के चिराग़ एक मुद्दत से जलाये बेठें हैं;
कौन कहता है मेरी फ़िक्र नहीं किसी को,
लोग क़ब्र मेरी पहले से खुदाए बेठें हैं;
Posted by विजय स्वामी at 7:29 AM 0 comments
Saturday, April 4, 2009
प्रिय बाबु- आपके लिए
जिन्दंगी में बाबु तुमसा हमसफ़र कहाँ मिलेगा
मोहब्बत लबों पे, जुबाँ में इतना असर कहाँ मिलेगा
तेरी निगाहों से रोशन हैं राह -ऐ -जिन्दंगी मेरी
मेरी तमन्न्नाओ को तुमसे बेहतर घर कहाँ मिलेगा
Posted by विजय स्वामी at 3:05 AM 0 comments