Tuesday, June 2, 2009

इतिहास विषय पढाने का क्या औचित्य है ? : मेरा दृष्टिकोण

स्कूल में पढता था तब अक्सर सोचा करता था की विज्ञानं, गणित इतियादी विषय किसी न किसी तरह से जीवन को प्रभावित करते हैं अथवा किंसी न किसी रूप में अपना योगदान देते हैं परन्तु इतिहास पर आते ही सुई अटक जाती थी । लाख सोचने पर भी इतिहास विषय को पदाने का औचित्य समझ में नहीं आता था। खैर , स्कूल का वक्त और था। परन्तु आज भी हम में से कितने युवा ऐसे हैं जो इस प्रश्न का ठोस उत्तर देने में सक्षम है ? ये लेख इस प्रशन का उत्तर खोजने की एक कोशिश मात्र है । समीक्षा लेखन क्षेत्र में मेरा ये प्रथम प्रयास है। संभावित त्रुटी के लिए कृपया क्षमा करें । आपके विचारो एवं टिपण्णी की प्रतीक्षा रहेगी।

विभ्भिन प्रतियोगी परीक्षाओं में इतिहास विषय के प्रश्न पत्र के सम्बन्ध में प्राय यह सुनने में आता है की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इस विषय का कोई औचित्य नहीं है। यहाँ तक कि इतिहास विषय के विधालयों में अध्यापन्न पर भी कई सवाल खड़े किए जाते रहे हैं । साथ ही वर्तमान परिपेक्ष्य में प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है । आलोचकों का तर्क है की प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का वर्तमान मानव जीवन से कोई व्यावहारिक सम्बन्ध कतई दृष्टिगोचर नहीं होता है , यथा रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरांत "स्टेशन मास्टर" के पद पर नियुक्त व्यक्ति के कार्यक्षेत्र में चन्द्रगुप्त की भला क्या भूमिका हो सकती है ? अथवा बाबर की तुलुगमा पद्दति उसके रेलवे सम्बन्धी क्रियाकलापों में किस तरह सहायक हो सकती है ?

यद्यपि सतही तौर पर देखने पर हम उपर्युक्त तर्कों को निराधार नही मान सकते परन्तु इतिहास विषय की प्रासंगिकता को सिरे से खारिज कर देना कदाचित एक बड़ी भूल होगी। इतिहास विषय की मूल विशेषता इसका विस्तृत एवं व्यापक कलेवर है जो साधारण अधययनार्थी के लिए अतिशय कठिन एवं दुर्बोध मालूम पङता है। अधिकांश अधययानार्थी इस विषय में वर्णित विभिन्न प्रकरणों, घटनाओं एवं प्रसंगों में अंतर्निहित मर्म एवं संदेशों को ग्रहण करने में विफल रहते हैं । वस्तुत: इतिहास अतीत को समाहित किए हुए सभी विषयों का मूल श्रोत है । विज्ञानं , सामाजिक ज्ञान , भूगोल इतियादी विषयों की जड़ें इतिहास में स्पष्टत: देखी जा सकती हैं , बशर्ते इस विषय के संधर्भ में एक पूर्वाग्रहरहित एवं व्यापक समझ विकसित की जाए।

जहाँ तक इस विषय के पठन-पाठन एवं प्रतियोगी परीक्षाओं में इसकी प्रासंगकिता का प्रश्न है तो इस सम्बन्ध में यह निशिचित तौर पर कहा जा सकता है कि इतिहास मनुष्य को एक सुदृढ़ नैतिक आधार प्रधान करता है एवं इस प्रकार अंतत: व्यावहारिक जीवन हेतु पृष्ठभूमि तैयार करता है । बचपन में दादी-नानी कि कहानियों से लेकर सुबह चाय कि प्याली के साथ समाचार-पत्र पढ़ते हुए हमें इतिहास के ही दर्शन होते हैं। इसमे कोई दो राय नहीं कि विगत घटनाओं का हमारे भावी जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है । इस प्रकार दादी-नानी द्वारा कही राजा-रानी की कहानियाँ जो मुख्यत इतिहास के पात्रों को ही चित्रित करती हैं एवं समाचार-पत्र आदि हमें बेहतर भविष्य की और अग्रसर होने में उत्प्रेरक-मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करते हैं। इतिहास विषय का सूक्ष्म अध्ययन एवं समझ जीवन , देश एवं काल के प्रति हमारे नज़रिए में आधारभूत एवं क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम है।

बाबर जैसे विराट पुरूष का संघर्षपूर्ण जीवन हमें कठिनाइयों से जूझने का संदेश देता है। आज का युवा प्रथम प्रयास में ही परिस्तिथितियों के समक्ष घुटने टेक देता है। इस सन्दर्भ में बाबर जैसे जुझारू पुरूष का जीवन हम में आत्म-विश्वाश से पूर्ण एवम जीवट से भरपूर जीवन के प्रति अनुराग पैदा करता है । हैदरअली जैसे धरातल से सत्ता की ऊँचाइयों को छू लेने वाले एतिहासिक व्यक्तित्व हमारे लिए सर्वोत्तम आदर्श स्थापित करते हैं । वर्तमान परिदृश्य में चहुँ और अन्याय , लाचारी, बईमानी, चोरी , भ्रष्टाचार अपने भयानक स्वरूप में परिलक्षित हो रहें हैं । ऐसे समाज में आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए आज बलबन एवं शेरशाह सूरी जैसे चरित्रों की महत्ती आवश्यकता है। नित्यप्रति महिलाओं से दुराचार हो रहा है। नारी की मर्यादा का हनन करने वाले असंख्य निर्लज्ज दुशाशन अपने पाशविक इरादों को अंजाम देने के लिए आज हर गली-नुक्कड़ पर घात लगाये बेठें हैं । इन दुशाशनों पर लगाम कसने के लिए श्रीकृषण जैसे इतिहास-पुरषों का आह्वान आधुनिक समय की सबसे बड़ी मांग है । जिस युग में पिता-भाई जैसे पावन रिश्ते भी हवश की बलिवेदी पर दम तोड़ चूंके हों उस युग को शिवाजी जैसे निर्मल हृदयी वीर की दरकार है जो उपहार स्वरुप भेंट की गई स्वाधीन शत्रुभार्या (शत्रु की पत्नी) को भी माँ का दर्जा देते हुए स्त्री-सम्मान का अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत करते हैं । इतिहास साक्षी है की सदभावनापूर्ण किए गए परोपकारी कार्यों के लिए निपट अनपढ़ अकबर 'महान' बन जाता है तो वहीं अति शिक्षित, धर्म शास्त्रों को कंठस्थ रखने वाला औरगंजेब का चरित्र हमारी घृणा का पात्र बनता है। इसके मूल में यही भाव निहित है की जहाँ हम सद्कर्मों के माध्यम से पूजनीय बन सकते हैं, वही कपटपूर्ण कार्यों द्वारा व्यक्ति , समाज एवं देश का अहित करते हैं जिसके लिए औरंगजेब की भांति भविष्य हमें कदापि क्षमा नहीं करेगा ।

तर्क में उल्लेखित "स्टेशन मास्टर" भी एक सामाजिक प्राणी है जो पद के माध्यम से समाज एवं देश की सेवा का कार्यभार वहन करता है । उसके द्वारा लिए गए निर्णयों से कई व्यक्तियों का जीवन प्रभावित होता है । इतिहास के चरित्रों , घटनाओं अथवा प्रसंगों से शिक्षा ग्रहण कर वह अपने कर्तव्यों का उत्तम प्रकार से निष्पादन कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वाश है

इस प्रकार इतिहास विषय मात्र घटनाओं का गठ्ठर अथवा बीते कल की जुगाली नहीं है , अपितु यह तो सुदूर उतरायण में टिमटिमाते हुए उस ध्रुव तारे के समान है जो यद्यपि पर्याप्त प्रकाश देने में अक्षम है तथापि दूषित एवं गिरते हुए जीवन मूल्यों की स्याह अँधेरी रात्रि में , जब चंहु और कोई सूर्य दिखाई नहीं पड़ता , हम दिग्भ्रमित मनुष्यों को सही दिशा का ज्ञान करा सकता है । अत: जरुरी है की हम इतिहास विषय के प्रति अपना दृष्टिकोण बदले । बेहतर कल के लिए इतिहास विषय पर अवलंबन वांछनीय है क्योंकि "इतिहास की पुनरावृति होती है"

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