लम्हा-लम्हा ये जिन्दंगी गुजर जायेगी,जिस्म -ऐ ख़ाक से रूह बिछड़ जायेगी;फ़िक्र करता हुं कि काबिल-ऐ-जिक्र बन जाऊं मगर,कोशिश वो लम्हा जाने कब लाएगी ;
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