मेरी प्रशंसा की छोटी सी घड़ी,
एक और से फिर न जा सकी सही;
मुझे न चाहने वालों में,
हैं लोग कई इक और सही ।।
मेरी भावनाओं के उकसाने पर,
हमेशा ही मैंने कुछ लिखा है,
जब कभी दर्द दिल में कसक-सी बन उभरा है
तो कभी प्यार
मुझे दिल के
गलियारों से गुजरते
कलम की स्याही से
कुछ कहने की चाहत से
शब्दों में ढलता हुआ दिखा है ।।
मैं लिखता हूँ शायद ---
भावनाओं के ज्वार को रोक पाने में जब कभी,
नाकामयाब हो जाता हूँ मैं;
जज्बातों के तेज दरिया में जब कभी,
डूबता हुआ-सा ख़ुद को पता हूँ मैं;
जब कभी जुबाँ न साथ दे पाती है दिल का,
तनहा ख़ुद को पाता हूँ मैं
तब, तब... न जाने कैसे?
बरबस ये हाथ चल पडतें हैं,
कुछ कहने की गरज से
कागज़ के खुरदरे धरातल पर
कलम की नोक से,
इच्छाओं, इरादों, यादों के
शब्द-रुपी भीज बोते जाते हैं
दिल के हमदर्द बनकर ।
लेकिन---
मेरी हर रचना अब कुछ डरी-सी, सहमी सी
लगती है मुझे,
मेरे भावों विचारों की हार-सी हुई
लगती है मुझे
जब कोई कहता है ,"क्या ये कहीं से चुराई हुई हैं?"
क्या मन के विचारों को चुरा सका है कोई,
'चोरी ' जैसे कलंक को
माथे का तिलक
बना सका है कोई
शायद तुम्हें न मालूम होगा ये
ओ ऐसा कहने वाले ,
पर मुझे है;
क्योंकि ---
जज्बातों को शब्दों में ढालने का हुनर है मुझमें,
चाहे किसी से कुछ कमतर ही सही;
उतरा हूँ मैं भी दिल की उन गहराइयों में,
जिनकी थाह ले पाना, हर किसी के लिए मुमकिन नहीं;
कहाँ सोचा होगा तुमने
ऐसा कुछ कहने से पहले
कि हर दिल में
कुछ सपने, यादें, इरादे होतें हैं
कुछ तमनायें होती हैं, कुछ वादे होते हैं;
और जो इनको अदा से कागज पे उतार पता है;
मेरे दोस्त,
संभवतया: वही कवि कहलाता है।
वैसे मेरी जिन्दगी के कुछ गिने-चुने वर्षों में,
मेरे आलोचक मेरे साथ रहे हैं,
परन्तुं---
इस दिल मेरे ने वो सब कुछ सहा है,
मुझे हमेशा सिर्फ़ इतना ही कहा है -
" नफ़रत करने वालों कि बस्ती में तेरी
रहने कि सदा आदत है रही,
तुझे न चाहने वालों में
हैं लोग कई इक और सही .
क्या फर्क तुम्हें पड़ता 'विजय' ?
इस बात को तू बस भूल यहीं,
तुझे न चाहने वालों में
मेरे भाई, चलो इक और सही ।। "
ये वहीं भावनाएं हैं मेरी
जो तुमसे ठोकर खाई हुई हैं ,
अब बताएं आलोचक महोदय
क्या ये भी चुराई हुई हैं?
Thursday, June 4, 2009
आलोचक के नाम...
Posted by विजय स्वामी at 12:09 PM
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