छुटपन का अहसास
अब कहाँ है मेरे पास,
रोजी-रोटी के बोझ तले
घुट रही है साँस,
कामयाबी के दर की, हवा चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
जिंदगी की अजीब राहें, न मालूम
कहाँ ख़त्म हो कहाँ ले जाएँ,
ये सफर, न कोई रहगुजर
वक्त की लम्बी डगर,
इस सफर में , इस डगर में, 'उसे' हमसफ़र चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
गम के पालने में मेरी
खुशियाँ अभी पल रहीं हैं,
इंतजार-ऐ-जवानी में जिनके
जिन्दंगी पिघल रही है ,
ख़ाक में मिलने से पहले 'उनका' दीदार चाहता हूँ
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
Thursday, June 4, 2009
जिन्दंगी मैं तुमसे और क्या चाहता हूँ ?
Posted by विजय स्वामी at 1:11 PM
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1 comments:
excellent!!
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