मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा;
मेरी जिन्दंगी इनायत तेरी,
मेरी ख्वाहिशों की तू इंतहा ।।
गम के अंधेरों से मुझको निकाला,
तुमसे ही जीवन में बिखरा उजाला;
तेरे प्यार की नहीं हद कहीं, तेरे प्यार की नहीं इंतहा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
ममता को मेरे कदमों में बिछाया,
दिल के घरोंदे में मुझको बसाया;
मन में बसी इबरत तेरी,
मेरी हर घड़ी की तू इश्तिहा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
आँचल के साये में मुझको छुपाया,
दिल के सिंहासन पे मुझको बैठाया;
मेरे पास हर पल तू है रही,
मेरे पास हर पल तू है सदा ।।
मेरी आत्मा की तू रोशनी,
मेरी जिंदगी का तू फलसफा...
Thursday, June 4, 2009
शमा-ऐ-जिन्दंगी (माँ)
Posted by विजय स्वामी at 11:54 AM
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